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क्या मोदी विरोध में अंधी हुई कांग्रेस पार्टी ? 9 साल पहले यह बिल को लाना चाहती थी कांग्रेस आज उसका विरोध क्यों ?

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देश को किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने इस साल 3 अध्यादेश जारी किए | इन तीनों अध्यादेशों को खेती और किसानों की तकदीर बदलने वाला एक बड़ा बदलाव माना गया | अब जब मोदी सरकार इन अध्यादेशों का कानून का जामा पहनाने जा रही है तो कांग्रेस इसके विरोध में उतर आई है | जबकि अपने सत्ताकाल में कांग्रेस खुद इसी तरह के कृषि सुधार करने की कोशिश कर रही थी | सरकार ने किसानों की भलाई के लिए किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल-2020, मूल्य आश्वासन तथा कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल -2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल -2020 संसद में पेश किए हैं |

इन तीनों बिलों का कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल सरकार का विरोध कर रहे हैं | साथ ही पंजाब समेत देश के कई हिस्सों में किसान भी सड़कों पर उतरे हुए हैं | ये विधेयक कोरोना काल में लाए गए कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020 और मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश 2020 की जगह लेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, विधेयकों से किसानों को लाभ होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर कहा, “ये विधेयक सही मायने में किसानों को बिचौलियों और तमाम अवरोधों से मुक्त करेंगे।” उन्होंने कहा, “इस कृषि सुधार से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए नए-नए अवसर मिलेंगे, जिससे उनका मुनाफा बढ़ेगा। इससे हमारे कृषि क्षेत्र को जहां आधुनिक टेक्नोलॉजी का लाभ मिलेगा, वहीं अन्नदाता सशक्त होंगे।” मोदी जी ने बिलों के विरोध को लेकर कहा कि किसानों को भ्रमित करने में बहुत सारी शक्तियां लगी हुई हैं। प्रधानमंत्री ने एक ट्वीट में साफ किया कि एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी

करीब 65 साल पुराने वस्तु अधिनियम कानून में संशोधन के लिए यह बिल लाया गया है | इस बिल में अनाज, दलहन, आलू, प्याज समेत कुछ खाद्य वस्तुओं (तेल) आदि को आवश्यक वस्तु की लिस्ट से बाहर करने का प्रावधान है | सरकार का तर्क है कि इससे प्राइवेट इन्वेस्टर्स को व्यापार करने में आसानी होगी और सरकारी हस्तक्षेप से मुक्ति मिलेगी | सरकार का ये भी दावा है कि इससे कृषि क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ावा मिल सकेगा | अब किसान अपनी मर्जी का मालिक होगा। वह मंडियों और बिचौलियों के जाल से निकल अपनी उपज को खेत पर ही कंपनियों, व्यापारियों आदि को बेच सकेगा। उसे इसके लिए मंडी की तरह कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। मंडी में इस वक्त किसानों से साढ़े आठ फीसद तक मंडी शुल्क वसूला जाता है। समान स्तर पर एमएनसी, बड़े व्यापारी आदि से करार कर सकेगा। किसानों को उपज की बिक्री के बाद कोर्ट कचहरी के चक्कर नहीं लगाना पड़ेंगे। उपज खरीदने वाले को 3 दिन के अंदर पेमंट करना होगा। तय समयावधि में विवाद का निपटारा एवं किसान को भुगतान सुनिश्चित होगा। विवाद होने पर इलाके का एसडीएम फैसला कर देगा। कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक एक इको-सिस्टम बनाएगा। किसानों को अपनी पसंद के अनुसार उपज की बिक्री-खरीद की स्वतंत्रता होगी। किसानों के पास फसल बेचने के लिए वैकल्पिक चैनल उपलब्ध होगा जिससे उनको उपज का लाभकारी मूल्य मिल पाएगा।

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP किसी फसल का वह दाम होता है जो सरकार बुवाई के वक़्त तय करती है। इससे किसानों को फसल की कीमत में अचानक गिरावट के प्रति सुरक्षा मिलती है। अगर बाजार में फसल के दाम कम होते हैं तो सरकारी एजेंसियां एमएसपी पर किसानों से फसल खरीद लेती हैं। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लोकसभा में कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बरकरार रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि इन विधेयकों से फसलों के एमएसपी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। किसानों से एमएसपी पर फसलों की खरीद जारी रहेगी। सरकारी खरीद की व्यवस्था ख़त्म नहीं की जा रही है, बल्कि किसानों को और विकल्प दिए गए हैं जहां वे अपनी फसल बेच सकते हैं। मंडी में जाकर लाइसेंसी व्यापारियों को ही अपनी उपज बेचने की मजबूरी ख़त्म हो गई है। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी समेत विपक्षी सदस्यों ने कहा कि राज्यों में किसानों का मंडी बाजार इससे खत्म हो जाएगा। अधीर ने कहा कि कृषि राज्य का विषय है। इस मसले पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों को है। केंद्र का यह कदम संघीय व्यवस्था के खिलाफ है। शिरोमणि अकाली दल के सांसद सुखबीर सिंह बादल ने लोकसभा में कहा कि इन विधेयकों से पंजाब के हमारे 20 लाख किसान प्रभावित होने जा रहे हैं। 30 हजार आढ़तिए, तीन लाख मंडी मजदूर, 20 लाख खेतिहर मजदूर इससे प्रभावित होने जा रहे हैं। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार ने भी विधेयकों की आलोचना की। तृणमूल कांग्रेस के नेता सौगत राय ने भी इन विधेयकों का विरोध किया है। केंद्र के मुताबिक, बिल पास होने के बाद किसान अपनी मर्जी का मालिक होगा। केंद्रीय कृषि मंत्री तोमर के मुताबिक किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाएगा। सरकार ने साफ किया है कि मंडी के साथ सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी। इस बिल से मंडियां भी प्रतिस्पर्धी होंगी और किसानों को उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा। राज्यों के अधिनियम के अंतर्गत संचालित मंडियां भी राज्य सरकारों के अनुसार चलती रहेगी। राज्य के लिए एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमिटी (एपीएमसी) ऐक्ट है, यह विधेयक उसे बिल्कुल भी छेड़ता नहीं है।

पंजाब की पार्टियां लगातार विरोध कर रही हैं। SAD के सुखबीर सिंह बादल के अनुसार, पंजाब में पूरी दुनिया में सबसे अच्छी मंडी व्यवस्था है, इस विधेयक के पारित होने के बाद चरमरा जाएगी। कांग्रेस ने भी लोकसभा में बिल के जरिए मंडी व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी, ऐसा दावा किया। विरोधियों का कहना है कि कंपनियां धीरे-धीरे मंडियों पर हावी हो जाएंगी और फिर मंडी सिस्टम खत्म हो जाएगा। इससे किसान कंपनियों के सीधे पंजे में आ जाएंगे और उनका शोषण होगा। बिल का विरोध कर रहे किसानों को डर है कि नए कानून के बाद एमएसपी पर खरीद नहीं होगी। विधेयक में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है कि मंडी के बाहर जो खरीद होगी वह एमएसपी से नीचे के भाव पर नहीं होगी।चूंकि बाहर बेचने पर कोई टैक्स नहीं देना होगा, ऐसे में किसानों को फायदा मिल सकता है। हालांकि अगर बाहर दाम कम मिलते हैं तो किसान मंडी आकर फसल बेच सकते हैं जहां उन्हें एमएसपी मिलेगा।

कई मंडियों में साढ़े आठ फीसदी तक टैक्स है। यह किसान से ही वसूला जाता है। यह बिल किसानों को अपने खेत से व्यापार की सुविधा देता है। मंडी के बाहर होने वाले इस व्यापार पर किसान को कोई टैक्स नहीं देना होगा। एमपीएमसी मंडियों का इन्फ्रास्ट्रक्चर पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में खासा बेहतर है। यहां एमएसपी पर गेहूं और धान की ज्यादा खरीद होती है। पंजाब में मंडियों और खरीद केंद्रों की संख्या करीब 1,840 है, ऐसी मंडी व्यवस्था दूसरी जगह नहीं है। हालांकि, एपीएमसी मंडियों में कृषि उत्पादों की खरीद पर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मंडी शुल्क व अन्य उपकर हैं। पंजाब में यह टैक्स करीब 4.5 फीसदी है। आढ़तियों और मंडी के कारोबारियों को डर है कि जब मंडी के बाहर बिना शुल्क का कारोबार होगा तो कोई मंडी आना नहीं चाहेगा। राजनीतिक दलों के विरोध की एक वजह ये भी हो सकती है कि उनके राजस्व के एक स्त्रोत पर असर पड़ सकता है। पंजाब और हरियाणा में बासमती निर्यातकों और कॉटन स्पिनिंग और जिनिंग मिल एसोसिएशनों ने तो मंडी शुल्क समाप्त करने की मांग की है। कांग्रेस खुद आज से 9 साल पहले किसानों के लिए यही बिल लेकर आई थी | जिस पर बाद में उसकी कई प्रदेश कांग्रेस सरकारों ने भी काम किया |

लेकिन अब जब मोदी सरकार किसानों के लिए उन्हीं किसान हितैषी बिलों को कानून का अमलीजामा पहनाने की कोशिश कर रही है तो कांग्रेस ने एकदम से रूख बदलकर इसे किसान विरोधी ठहराना शुरू कर दिया है | इससे उसके रूख पर कृषि विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं | वे कह रहे हैं कि जब तक कांग्रेस खुद इन बिलों पर काम कर रही थी, तब तक उसके लिए ये किसान हितैषी थे | वहीं अब जब मोदी सरकार उन बिलों पर कदम आगे बढ़ा रही है तो ये बिल किसान विरोधी हो गए हैं |

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