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Monday, January 25, 2021

लेखन्या: अग्रदूतस्य शतचत्वारिंशत् जयन्त्याम् विशेषम् ! कलम के अग्रदूत की 140 वीं जयन्ती पर विशेष !

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मुंशी प्रेमचंदस्य सादरम् समर्पितं –
ऋणे नत मम अयम् लेखनी, सम्प्रति त्वमेव वद लिखानि किं च् !
शब्दम् कुंठितुम् मम तु, सम्प्रति त्वमेव वद कथानि अद्य किं !!
रसात् रसना समन्वितम् न मम सरसम्,
मेघसि चित्रम् निर्मयित्वा मयि वर्षानि,
शांतम् वाणीम् न अस्ति मम श्रृणोनि,सम्प्रति त्वमेव वद पठानि अद्य किं !!

मुंशी प्रेमचंद को सादर समर्पित –
कर्ज में डूबी मेरी यह लेखनी,अब तुम ही बताओ लिखूँ और क्या !
शब्द कुंठित हुए हैं मेरे मगर,अब तुम ही बताओ कहूँ आज क्या !!
रस से रसना जुड़ी न मेरी सरस्,
मेघ छवि बनाकर मुझ पे बरस,
शांत वाणी नहीं है मेरी सुनो,अब तुम ही बताओ पढूं आज क्या !!

प्रेमचंदस्य वास्तविक नाम धनपत राय इत्यासीत् ! तस्य जन्म ३१ जुलाइतः १८८० तमे बनारस नगरात् चत्वारि क्रोशम् द्रुते लमही इति नामकम् ग्रामे अभवत् स्म ! अस्य पितु नाम मुंशी अजायब राय आसीत्, यत् डाकगृहे लिपिकम् पदे आसीत् !

प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय था ! उनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस शहर से चार मील दूर लमही नामक गांव में हुआ था ! इनके पिता का नाम मुंशी अजायब राय था, जो डाकघर में मुंशी का पद पर थे !

प्रेमचंद: यदा षड वर्षस्य आसीत्, तदा तेन लालगंज ग्रामे न्यवसत् एकस्य मौलवीस्य गृह फारसी उर्दू च् पठनाय अप्रेषयत् ! सः यदा बहैव लघु आसीत्, रोगस्य कारणम् अस्य मातुः निधनम् अभवत् ! तेन प्रेमम् स्व अग्रजया अमिलत् ! भगिन्या: विवाह उपरांत सः एकाकी अभवत् ! एकांत गृहे सः स्वयमस्य कथानकानि पठने व्यस्तम् अकरोत् ! अग्रे चलित्वा सः स्वयम् कथानकानि लिख्यते श्रेष्ठ कथाकारम् च् निर्मयते !

प्रेमचंद जब 6 वर्ष के थे, तब उन्हें लालगंज गांव में रहने वाले एक मौलवी के घर फारसी और उर्दू पढ़ने के लिए भेजा गया ! वह जब बहुत ही छोटे थे, बीमारी के कारण इनकी मां का देहांत हो गया ! उन्हें प्यार अपनी बड़ी बहन से मिला ! बहन के विवाह के बाद वह अकेले हो गए ! सूने घर में उन्होंने खुद को कहानियां पढ़ने में व्यस्त कर लिया ! आगे चलकर वह स्वयं कहानियां लिखने लगे और महान कथाकार बने !

बहराइचस्यपि सौभग्यतः !

बहराइच का भी रहा सौभाग्य !

प्रेमचंद: वर्ष १९०० तमे २० वर्षस्य उम्रे शिक्षण कार्येण द्विदलम् रोटिकाय संघर्षम् आरम्भयत् स्म ! चिनारे १८रूप्यकाणि प्रत्येक मासे एकम् स्ववित्तपोषितम् विद्यालये प्राध्यापकस्य पदे नियुक्तुम् ! अत्रात् षड मास उपरांतम् तस्य चयनम् तत्कालीनम् जनपद विद्यालयं बहराइच वर्तमाने राजकीय इंटर कालेज इत्ये अभवत् स्म !

प्रेमचंद ने वर्ष 1900 में 20 वर्ष की आयु में शिक्षण कार्य से दाल रोटी के लिए संघर्ष शुरू किया था ! चिनार में 18 रुपये प्रति माह पर एक निजी विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर तैनात हुए ! यहां से छह माह बाद उनका चयन तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट स्कूल बहराइच वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज में हो गया था !

बहराइचे पंचम् शिक्षकस्य रूपे मुंशी प्रेमचंदस्य नियुक्तिम् अप्राप्तत् स्म ! तु अत्रे केवलं त्रय मासेव मुंशी प्रेमचंद: शिक्षण कार्यम् अकरोत् ! अस्य उपरांत तस्य स्थानांतरण जनपद विद्यालय प्रतापगढ़े प्राध्यापकस्य पदे अभवत् !

बहराइच में पांचवें शिक्षक के रूप में मुंशी प्रेमचंद को तैनाती मिली थी ! लेकिन यहां पर सिर्फ तीन महीने ही मुंशी प्रेचमंद ने शिक्षण कार्य किया ! इसके बाद उनका तबादला डिस्ट्रिक्ट स्कूल प्रतापगढ़ में हेडमास्टर के पद पर हुआ !

प्रेमचंद: बहराइचे स्वरूप शिक्षकः नियुक्त अवश्यम् अरहत्, तु तेन चिह्नम् सम्प्रति अवशेषम् नास्ति ! केवलं अभिलेखे उल्लेखम् प्राप्तयति ! राजकीय इंटर कॉलेजे तत् उपस्थिति पंजिकापि सम्प्रति उप्लब्धम् न अस्ति, यस्मिन् मुंशी प्रेमचंद: हस्ताक्षरम् करोति स्म !

प्रेमचंद बहराइच में बतौर शिक्षक तैनात जरूर रहे, लेकिन उनकी निशानी अब शेष नहीं है ! सिर्फ गजेटियर में उल्लेख मिलता है ! राजकीय इंटर कॉलेज में वह उपस्थिति पंजिका भी अब मौजूद नहीं है, जिसमें मुंशी प्रेमचंद हस्ताक्षर करते थे !

कस्मात् अनिर्मयत् धनपत रायात् परमचंद:, प्रेमचंदात् मुंशी प्रेमचंद: ?

कैसे बनें धनपत राय से प्रेमचंद,प्रेमचंद से मुंशी प्रेमचंद ?


स्वमित्र मुंशी दया नारायण निगमस्य प्रस्तावे तेन धनपत रायस्य अतरिक्तम् प्रेमचंद: उपनाम अधारयत् ! हंस पत्रिकाया: सम्पादकम् प्रेमचंद: कन्हैया लाल मुंशी: च् आसीत् ! तु कालांतरे पाठका: मुंशी: प्रेमचंदस्य च् एकः अमानयत् प्रेमचंद: च् मुंशी प्रेमचंद: अनिर्मयत् !

अपने मित्र मुंशी दया नारायण निगम के सुझाव पर उन्होंने धनपत राय की बजाय प्रेमचंद उपनाम रख लिया ! हंस पत्रिका के संपादक प्रेमचंद और कन्हैया लाल मुंशी थे ! परन्तु कालांतर में पाठकों ने मुंशी और प्रेमचंद को एक मान लिया और प्रेमचंद मुंशी प्रेमचंद बन गए !

मुंशे: लेखम् !

मुंशी जी के लेख !

मुंशी: जंजीवनम् बहु गर्तेन अपश्यत् स्व च् जीवनम् साहित्यम् समर्पितम् अकरोत् ! परमचंदस्य ख्यातिप्राप्तम् कथानकानि सन्ति – मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, आत्माराम, बूढ़ी काकी, बड़े भाई साहब, बड़े घर की बेटी, कफ़न, उधार की घड़ी, नमक का दरोगा, पंच फूल, प्रेम पूर्णिमा, जुर्माना, इत्यादयः ! प्रेमचंदस्य उपन्यासः – गबन, बाजार-ए-हुस्न ( उर्दू में ), सेवा सदन, गोदान, कर्मभूमि, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, प्रेमा मंगल-सूत्र ( अपूर्ण ) च् !

मुंशी जी ने जनजीवन को बहुत गहराई से देखा और अपना जीवन साहित्य को समर्पित कर दिया ! प्रेमचंद की चर्चित कहानियां हैं – मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, आत्माराम, बूढ़ी काकी, बड़े भाई साहब, बड़े घर की बेटी, कफन, उधार की घड़ी, नमक का दरोगा, पंच फूल, प्रेम पूर्णिमा, जुर्माना आदि ! प्रेमचन्‍द के उपन्‍यास – गबन, बाजार-ए-हुस्न (उर्दू में), सेवा सदन, गोदान, कर्मभूमि, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, प्रेमा और मंगल-सूत्र ( अपूर्ण ) !

प्रेमचंद: ३०० कथानकानि चतुर्दश बृहद उपन्यासानि च् अलिखत् ! १९३५ तमे मुंशी: रुग्णः जातः ८ अक्टूबर १९३६ तमस्य ५६ वर्षस्य उम्रे तस्य निधनम् अभवत् ! तस्य रचयतु साहित्यस्य अनुवादम् सर्वे प्रमुख भाषेषु अभवत्, विदेशी भाषेषु अपि !

प्रेमचंद ने 300 कहानियां और चौदह बड़े उपन्यास लिखे ! 1935 में मुंशी जी बहुत बीमार पड़ गए और 8 अक्टूबर 1936 को 56 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया ! उनके रचे साहित्य का अनुवाद सभी प्रमुख भाषाओं में हो चुका है, विदेशी भाषाओं में भी !

तस्य रचनेषु चित्रपटानि अपि अनिर्मयत् !

उनकी रचनाओं पर फिल्में भी बनी !

सत्यजीत राय: तस्य द्वय कथानकयो अविस्मरम् चित्रपटानि अनिर्मयत् ! १९७७ तमे शतरंज के खिलाड़ी १९८१ तमे सद्गति च् ! के. सुब्रमण्यम: १९३८ तमे सेवा सदन उपन्यासे चित्रपटम् अनिर्मयत् यस्यां सुब्बालक्ष्मी मुख्य भूमिकाम् अनिर्वहत् स्म ! १९७७ तमे मृणाल सेन: प्रेमचंदस्य कथानकम् कफ़न आधारितम् ओका ऊरी कथा नामेण एकम् तेलुगू चित्रपटस्य अनिर्मयत् यस्य सर्वश्रेष्ठ तेलुगू चित्रपटस्य राष्ट्रीय पुरस्कारमपि अप्राप्यत् ! १९६३ तमे गोदान १९६६ तमे च् गबन उपन्यासे लोकप्रियम् चित्रपटानि अनिर्मयत् ! १९८० तमे तस्य उपन्यासे निर्मित टीवी धारावाहिकम् निर्मला अपि बहु लोकप्रियम् अभवत् स्म !

सत्यजीत राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फिल्में बनाईं ! 1977 में शतरंज के खिलाड़ी और 1981 में सद्गति ! के. सुब्रमण्यम ने 1938 में सेवासदन उपन्यास पर फिल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी ! 1977 में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी कफन पर आधारित ओका ऊरी कथा नाम से एक तेलुगू फिल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला ! 1963 में गोदान और 1966 में गबन उपन्यास पर लोकप्रिय फिल्में बनीं ! 1980 में उनके उपन्यास पर बना टीवी धारावाहिक निर्मला भी बहुत लोकप्रिय हुआ था !

भरतीय डाकेनपि अप्राप्तयत् सम्मानम् !

भारतीय डाक द्वारा भी मिला सम्मान !

प्रेमचंदस्य स्मृते भारतीय डाक तार विभाग प्रत्येन ३० जुलाइतः १९८० तमम् तस्य जन्मशतिस्य अवसरे ३० पर्ण शुल्कस्य एकः डाक टिकट अप्रस्तुतयत् !

प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक तार विभाग की ओर से 30 जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया !

लेखन्या: अग्रदूतम् सादरम् नमन !

लेखनी के अग्रदूत को सादर नमन !

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