22.1 C
New Delhi

लेखन्या: अग्रदूतस्य शतचत्वारिंशत् जयन्त्याम् विशेषम् ! कलम के अग्रदूत की 140 वीं जयन्ती पर विशेष !

Date:

Share post:

मुंशी प्रेमचंदस्य सादरम् समर्पितं –
ऋणे नत मम अयम् लेखनी, सम्प्रति त्वमेव वद लिखानि किं च् !
शब्दम् कुंठितुम् मम तु, सम्प्रति त्वमेव वद कथानि अद्य किं !!
रसात् रसना समन्वितम् न मम सरसम्,
मेघसि चित्रम् निर्मयित्वा मयि वर्षानि,
शांतम् वाणीम् न अस्ति मम श्रृणोनि,सम्प्रति त्वमेव वद पठानि अद्य किं !!

मुंशी प्रेमचंद को सादर समर्पित –
कर्ज में डूबी मेरी यह लेखनी,अब तुम ही बताओ लिखूँ और क्या !
शब्द कुंठित हुए हैं मेरे मगर,अब तुम ही बताओ कहूँ आज क्या !!
रस से रसना जुड़ी न मेरी सरस्,
मेघ छवि बनाकर मुझ पे बरस,
शांत वाणी नहीं है मेरी सुनो,अब तुम ही बताओ पढूं आज क्या !!

प्रेमचंदस्य वास्तविक नाम धनपत राय इत्यासीत् ! तस्य जन्म ३१ जुलाइतः १८८० तमे बनारस नगरात् चत्वारि क्रोशम् द्रुते लमही इति नामकम् ग्रामे अभवत् स्म ! अस्य पितु नाम मुंशी अजायब राय आसीत्, यत् डाकगृहे लिपिकम् पदे आसीत् !

प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय था ! उनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस शहर से चार मील दूर लमही नामक गांव में हुआ था ! इनके पिता का नाम मुंशी अजायब राय था, जो डाकघर में मुंशी का पद पर थे !

प्रेमचंद: यदा षड वर्षस्य आसीत्, तदा तेन लालगंज ग्रामे न्यवसत् एकस्य मौलवीस्य गृह फारसी उर्दू च् पठनाय अप्रेषयत् ! सः यदा बहैव लघु आसीत्, रोगस्य कारणम् अस्य मातुः निधनम् अभवत् ! तेन प्रेमम् स्व अग्रजया अमिलत् ! भगिन्या: विवाह उपरांत सः एकाकी अभवत् ! एकांत गृहे सः स्वयमस्य कथानकानि पठने व्यस्तम् अकरोत् ! अग्रे चलित्वा सः स्वयम् कथानकानि लिख्यते श्रेष्ठ कथाकारम् च् निर्मयते !

प्रेमचंद जब 6 वर्ष के थे, तब उन्हें लालगंज गांव में रहने वाले एक मौलवी के घर फारसी और उर्दू पढ़ने के लिए भेजा गया ! वह जब बहुत ही छोटे थे, बीमारी के कारण इनकी मां का देहांत हो गया ! उन्हें प्यार अपनी बड़ी बहन से मिला ! बहन के विवाह के बाद वह अकेले हो गए ! सूने घर में उन्होंने खुद को कहानियां पढ़ने में व्यस्त कर लिया ! आगे चलकर वह स्वयं कहानियां लिखने लगे और महान कथाकार बने !

बहराइचस्यपि सौभग्यतः !

बहराइच का भी रहा सौभाग्य !

प्रेमचंद: वर्ष १९०० तमे २० वर्षस्य उम्रे शिक्षण कार्येण द्विदलम् रोटिकाय संघर्षम् आरम्भयत् स्म ! चिनारे १८रूप्यकाणि प्रत्येक मासे एकम् स्ववित्तपोषितम् विद्यालये प्राध्यापकस्य पदे नियुक्तुम् ! अत्रात् षड मास उपरांतम् तस्य चयनम् तत्कालीनम् जनपद विद्यालयं बहराइच वर्तमाने राजकीय इंटर कालेज इत्ये अभवत् स्म !

प्रेमचंद ने वर्ष 1900 में 20 वर्ष की आयु में शिक्षण कार्य से दाल रोटी के लिए संघर्ष शुरू किया था ! चिनार में 18 रुपये प्रति माह पर एक निजी विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर तैनात हुए ! यहां से छह माह बाद उनका चयन तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट स्कूल बहराइच वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज में हो गया था !

बहराइचे पंचम् शिक्षकस्य रूपे मुंशी प्रेमचंदस्य नियुक्तिम् अप्राप्तत् स्म ! तु अत्रे केवलं त्रय मासेव मुंशी प्रेमचंद: शिक्षण कार्यम् अकरोत् ! अस्य उपरांत तस्य स्थानांतरण जनपद विद्यालय प्रतापगढ़े प्राध्यापकस्य पदे अभवत् !

बहराइच में पांचवें शिक्षक के रूप में मुंशी प्रेमचंद को तैनाती मिली थी ! लेकिन यहां पर सिर्फ तीन महीने ही मुंशी प्रेचमंद ने शिक्षण कार्य किया ! इसके बाद उनका तबादला डिस्ट्रिक्ट स्कूल प्रतापगढ़ में हेडमास्टर के पद पर हुआ !

प्रेमचंद: बहराइचे स्वरूप शिक्षकः नियुक्त अवश्यम् अरहत्, तु तेन चिह्नम् सम्प्रति अवशेषम् नास्ति ! केवलं अभिलेखे उल्लेखम् प्राप्तयति ! राजकीय इंटर कॉलेजे तत् उपस्थिति पंजिकापि सम्प्रति उप्लब्धम् न अस्ति, यस्मिन् मुंशी प्रेमचंद: हस्ताक्षरम् करोति स्म !

प्रेमचंद बहराइच में बतौर शिक्षक तैनात जरूर रहे, लेकिन उनकी निशानी अब शेष नहीं है ! सिर्फ गजेटियर में उल्लेख मिलता है ! राजकीय इंटर कॉलेज में वह उपस्थिति पंजिका भी अब मौजूद नहीं है, जिसमें मुंशी प्रेमचंद हस्ताक्षर करते थे !

कस्मात् अनिर्मयत् धनपत रायात् परमचंद:, प्रेमचंदात् मुंशी प्रेमचंद: ?

कैसे बनें धनपत राय से प्रेमचंद,प्रेमचंद से मुंशी प्रेमचंद ?


स्वमित्र मुंशी दया नारायण निगमस्य प्रस्तावे तेन धनपत रायस्य अतरिक्तम् प्रेमचंद: उपनाम अधारयत् ! हंस पत्रिकाया: सम्पादकम् प्रेमचंद: कन्हैया लाल मुंशी: च् आसीत् ! तु कालांतरे पाठका: मुंशी: प्रेमचंदस्य च् एकः अमानयत् प्रेमचंद: च् मुंशी प्रेमचंद: अनिर्मयत् !

अपने मित्र मुंशी दया नारायण निगम के सुझाव पर उन्होंने धनपत राय की बजाय प्रेमचंद उपनाम रख लिया ! हंस पत्रिका के संपादक प्रेमचंद और कन्हैया लाल मुंशी थे ! परन्तु कालांतर में पाठकों ने मुंशी और प्रेमचंद को एक मान लिया और प्रेमचंद मुंशी प्रेमचंद बन गए !

मुंशे: लेखम् !

मुंशी जी के लेख !

मुंशी: जंजीवनम् बहु गर्तेन अपश्यत् स्व च् जीवनम् साहित्यम् समर्पितम् अकरोत् ! परमचंदस्य ख्यातिप्राप्तम् कथानकानि सन्ति – मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, आत्माराम, बूढ़ी काकी, बड़े भाई साहब, बड़े घर की बेटी, कफ़न, उधार की घड़ी, नमक का दरोगा, पंच फूल, प्रेम पूर्णिमा, जुर्माना, इत्यादयः ! प्रेमचंदस्य उपन्यासः – गबन, बाजार-ए-हुस्न ( उर्दू में ), सेवा सदन, गोदान, कर्मभूमि, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, प्रेमा मंगल-सूत्र ( अपूर्ण ) च् !

मुंशी जी ने जनजीवन को बहुत गहराई से देखा और अपना जीवन साहित्य को समर्पित कर दिया ! प्रेमचंद की चर्चित कहानियां हैं – मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, आत्माराम, बूढ़ी काकी, बड़े भाई साहब, बड़े घर की बेटी, कफन, उधार की घड़ी, नमक का दरोगा, पंच फूल, प्रेम पूर्णिमा, जुर्माना आदि ! प्रेमचन्‍द के उपन्‍यास – गबन, बाजार-ए-हुस्न (उर्दू में), सेवा सदन, गोदान, कर्मभूमि, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, प्रेमा और मंगल-सूत्र ( अपूर्ण ) !

प्रेमचंद: ३०० कथानकानि चतुर्दश बृहद उपन्यासानि च् अलिखत् ! १९३५ तमे मुंशी: रुग्णः जातः ८ अक्टूबर १९३६ तमस्य ५६ वर्षस्य उम्रे तस्य निधनम् अभवत् ! तस्य रचयतु साहित्यस्य अनुवादम् सर्वे प्रमुख भाषेषु अभवत्, विदेशी भाषेषु अपि !

प्रेमचंद ने 300 कहानियां और चौदह बड़े उपन्यास लिखे ! 1935 में मुंशी जी बहुत बीमार पड़ गए और 8 अक्टूबर 1936 को 56 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया ! उनके रचे साहित्य का अनुवाद सभी प्रमुख भाषाओं में हो चुका है, विदेशी भाषाओं में भी !

तस्य रचनेषु चित्रपटानि अपि अनिर्मयत् !

उनकी रचनाओं पर फिल्में भी बनी !

सत्यजीत राय: तस्य द्वय कथानकयो अविस्मरम् चित्रपटानि अनिर्मयत् ! १९७७ तमे शतरंज के खिलाड़ी १९८१ तमे सद्गति च् ! के. सुब्रमण्यम: १९३८ तमे सेवा सदन उपन्यासे चित्रपटम् अनिर्मयत् यस्यां सुब्बालक्ष्मी मुख्य भूमिकाम् अनिर्वहत् स्म ! १९७७ तमे मृणाल सेन: प्रेमचंदस्य कथानकम् कफ़न आधारितम् ओका ऊरी कथा नामेण एकम् तेलुगू चित्रपटस्य अनिर्मयत् यस्य सर्वश्रेष्ठ तेलुगू चित्रपटस्य राष्ट्रीय पुरस्कारमपि अप्राप्यत् ! १९६३ तमे गोदान १९६६ तमे च् गबन उपन्यासे लोकप्रियम् चित्रपटानि अनिर्मयत् ! १९८० तमे तस्य उपन्यासे निर्मित टीवी धारावाहिकम् निर्मला अपि बहु लोकप्रियम् अभवत् स्म !

सत्यजीत राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फिल्में बनाईं ! 1977 में शतरंज के खिलाड़ी और 1981 में सद्गति ! के. सुब्रमण्यम ने 1938 में सेवासदन उपन्यास पर फिल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी ! 1977 में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी कफन पर आधारित ओका ऊरी कथा नाम से एक तेलुगू फिल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला ! 1963 में गोदान और 1966 में गबन उपन्यास पर लोकप्रिय फिल्में बनीं ! 1980 में उनके उपन्यास पर बना टीवी धारावाहिक निर्मला भी बहुत लोकप्रिय हुआ था !

भरतीय डाकेनपि अप्राप्तयत् सम्मानम् !

भारतीय डाक द्वारा भी मिला सम्मान !

प्रेमचंदस्य स्मृते भारतीय डाक तार विभाग प्रत्येन ३० जुलाइतः १९८० तमम् तस्य जन्मशतिस्य अवसरे ३० पर्ण शुल्कस्य एकः डाक टिकट अप्रस्तुतयत् !

प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक तार विभाग की ओर से 30 जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया !

लेखन्या: अग्रदूतम् सादरम् नमन !

लेखनी के अग्रदूत को सादर नमन !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Related articles

The Asymmetric Advantage: How Iran Maintains Strategic Leverage in the Middle East

In the traditional calculus of military power, the United States and its allies—including Israel and the Gulf monarchies—possess...

Navigating the Geopolitical Storm: How the Indian Government is Mitigating Risks from Iran-USA Tensions

The perennial volatility between the United States and Iran presents one of the most complex diplomatic challenges for...

The Global Butterfly Effect: The Multi-Dimensional Impact of an Iran-USA-Israel War

The prospect of a full-scale direct war between Iran, the United States, and Israel is no longer a...

Calculated Brinkmanship or Strategic Blunder? Analyzing the Risks of the Netanyahu-Trump Approach to Iran

The geopolitical landscape of the Middle East has shifted from a decades-long “shadow war” into a direct, kinetic...